🕉️ Bhajans, Aartis & Mantras · Ep 23
Dussehra Special: Who Warned Ravan? A Melodious Geet (Chaupai + Geet)
रावण को किसने समझाया? 🎶 मधुर गीत में पूरी कथा | चौपाई + गीत | रामचरितमानस | दशहरा 2026
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तब मारीच हृदयँ अनुमाना। नवहि बिरोधें नहिं कल्याना॥ तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नररूप चराचर ईसा॥ तासों तात बयरु नहिं कीजै। मारें मरिअ जिआएँ जीजै॥ सुन ले दसशीश, मेरी बात को तू जान ले, वो नर नहीं नारायण हैं, इतना तो तू मान ले।
उनके एक बाण से मैं, सौ योजन दूर गिरा, आज तलक उस पल का डर, मन में मेरे है भरा। जिनके हाथ में जीवन-धारा, उनसे कैसा बैर, चराचर के स्वामी से लड़कर, किसकी होगी ख़ैर? रावण बोला — हिरण बन जा, देर न कर तू पल भर, मारीच ने सोचा — राम की शरण ही सबसे बेहतर! बिनती करउँ जोरि कर रावन।
सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥ देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥ राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राजु तुम्ह करहू॥ हाथ जोड़कर कहता हूँ, सुन ले लंका के राजा, छोड़ दे अभिमान ज़रा, खोल दे मन का दरवाज़ा। देख अपना कुल महान, पुलस्त्य ऋषि का नाम, भ्रम को छोड़ और भज ले, भक्तों के रक्षक राम।
राम-चरण को हृदय में रख, कर ले ये उपकार, अचल रहेगी लंका तेरी, अचल तेरा दरबार। सीता माँ को लौटा दे, यही धर्म का काम, शरणागत को गले लगाते, करुणासागर राम! सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥ जहाँ सुमति तहँ संपति नाना।
जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥ भैया, काम-क्रोध-मद-लोभ, पतन की ये राहें हैं, संत जिन्हें भजते हैं, उनकी खुली बाँहें हैं। राम कोई नर-राजा नहीं, वो तीनों लोकों के ईश, उनके आगे झुक जाओ, झुका दो अपना शीश। सुमति-कुमति दोनों रहतीं, हर इक मन के अंदर, सुमति जहाँ वहाँ संपत्ति, कुमति में दुख का समंदर। भरी सभा में रावण ने, भाई को ठुकराया, फिर भी विभीषण बोले — राम भजो, यही समझाया!
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहू॥ नाथ बयरु कीजे ताही सों। बुधि बल सकिअ जीति जाही सों॥ तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा। खलु खद्योत दिनकरहि जैसा॥ स्वामी, हरि से बैर तजो, मेरी बात हृदय में धर लो, आँचल फैला माँगूँ तुमसे, क्रोध को अब वश में कर लो।
बैर उसी से कीजे जिसको, बुद्धि-बल से जीत सको, तुम में, राम में अंतर कितना — जुगनू-सूरज देख सको। सीता को सम्मान से लौटा, यही है सच्ची भलाई, मंदोदरी की विनती सुन लो, मेरे लंका के राई। हँसकर बोला अभिमानी — नारी का मन तो डरता है, किसे पता था अहंकार का दीपक ऐसे बुझता है! दसन गहहु तृन कंठ कुठारी।
परिजन सहित संग निज नारी॥ सादर जनकसुता करि आगें। एहि बिधि चलहु सकल भय त्यागें॥ जौं मम चरन सकसि सठ टारी। फिरहिं रामु सीता मैं हारी॥ मैं हूँ बालि-पुत्र अंगद, राम का दूत बनकर आया, भरी सभा में रावण तुझको, अंतिम बार समझाने आया। दाँतों में तिनका दबा ले, छोड़ दे सारा अभिमान, परिवार को संग में लेकर, कर ले राम का सम्मान।
सीता माँ को आगे करके, सारा भय तू त्याग, त्राहिमाम पुकार ले, बुझ जाएगी ये आग। मेरा पाँव ज़मीं पे रखा, दम है तो इसे उठा, हारूँ मैं सीता माँ को, जो तू ये पग दे हटा। सारे योद्धा ज़ोर लगाकर, हार गए एक-एक, रावण ख़ुद जब झुका तो अंगद बोले हँसकर, देख — मेरे चरण क्यों पकड़े, पकड़ ले राम के चरण, वहीं मिलेगी तुझको सच्ची, अभय की शरण! खैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस।
रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस॥ डोली भूमि गिरत दसकंधर। छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर॥ तासु तेज समान प्रभु आनन। हरषे देखि संभु चतुरानन॥ हनुमत ने समझाया, विभीषण ने समझाया, मंदोदरी ने विनती की, अंगद ने आईना दिखाया। मारीच ने भी रोका था, पर कोई ना भाया, अहंकार का पर्दा ऐसा, सच ना नज़र आया।
रणभूमि में रघुवर ने, धनुष कान तक ताना, इकतीस बाण छूटे तो, थम गया सारा ज़माना। धरती डोली, सागर काँपा, गिरा वो दसकंधर, उसका तेज प्रभु में समाया, हर्षे देव निरंतर। आज भी ये दशहरा, हम सबको यही सिखाए, अहंकार में अंधा मन, हर सलाह ठुकराए। सलाह सुनो, सिर झुकाओ, मन से राम को ध्याओ, बुराई पर अच्छाई की जय — जय श्री राम गाओ!



