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🪔 Navratri 2026: Nine Goddesses, Nine Messages · Ep 20

Durga Saptashati Part 9: Chapter 13 (Boons to Suratha and Samadhi)

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दुर्गा सप्तशती कथा भाग 9 🔱 अध्याय 13 — सुरथ और वैश्य को वरदान | नवरात्रि दिन 9 (समापन)

This video is narrated in Hindi; YouTube's auto-translated captions are available.

Read the full story (in Hindi)

नमस्ते, ज्योति यात्रा में आपका स्वागत है। आज सुनिए पुराणों की एक ऐसी कथा, जो बहुत कम सुनाई जाती है। नवरात्रि का नौवाँ दिन। श्री दुर्गा सप्तशती कथा का भाग नौ और अंतिम अध्याय, तेरह।

आज वह कथा पूरी होती है, जो पहले दिन जंगल में भटकते राजा सुरथ से शुरू हुई थी। इस अध्याय के ध्यान में माँ उगते सूर्य के मंडल जैसी आभा वाली हैं चार भुजाएँ, तीन नेत्र, और हाथों में पाश, अंकुश, वर और अभय मुद्रा। ऐसी कल्याणमयी शिवा का हम ध्यान करते हैं। याद कीजिए राजा सुरथ अपना राज्य हारकर वन में आए थे, और समाधि नाम के वैश्य को उनके अपने परिवार ने घर से निकाल दिया था।

फिर भी दोनों का मन उन्हीं लोगों और उन्हीं चीज़ों में अटका था। उसी प्रश्न का उत्तर देने के लिए मेधा ऋषि ने उन्हें देवी का यह पूरा माहात्म्य सुनाया था। अब अंत में ऋषि कहते हैं — राजन्, यही देवी का उत्तम माहात्म्य है। जो देवी इस जगत को धारण करती हैं, वही विद्या भी देती हैं।

उन्हीं भगवान विष्णु की महामाया से तुम, यह वैश्य, और दूसरे विवेकी लोग भी मोहित होते रहे हैं, और आगे भी होंगे। इसलिए, महाराज, तुम उन्हीं परमेश्वरी की शरण में जाओ। आराधना करने पर वही मनुष्यों को भोग, स्वर्ग और मोक्ष सब कुछ देती हैं। मेधा ऋषि की यह बात सुनकर राजा सुरथ ने उन महाभाग, कठोर व्रत वाले ऋषि को प्रणाम किया।

अपने राज्य के छिन जाने और ममता के कारण वे बहुत दुखी थे। और वे राजा, उस वैश्य के साथ, तुरंत तपस्या के लिए चल पड़े। माँ के दर्शन के लिए वे एक नदी के किनारे जाकर बैठ गए। वहाँ उन्होंने नदी के किनारे की मिट्टी से देवी की एक प्रतिमा बनाई एक मृण्मयी मूर्ति।

और उसी के सामने बैठकर वे देवी सूक्त का जप करने लगे। फूल, धूप, अग्नि और जल से वे उस मूर्ति की पूजा करते। कभी निराहार रहते, कभी अल्प आहार लेते। मन को माँ में लगाकर, एकाग्र होकर, वे दोनों तपस्या करते रहे।

बारिश आई, सर्दी आई, गर्मी आई पर वे डिगे नहीं। तीन वर्षों तक वे इसी प्रकार संयम से माँ की आराधना करते रहे। तब तीन वर्ष बाद, जगत को धारण करने वाली चंडिका प्रसन्न होकर साक्षात् उनके सामने प्रकट हुईं, और बोलीं राजन्, और कुल को आनंद देने वाले वैश्य, तुम जो चाहते हो, वह माँगो। मैं प्रसन्न हूँ तुम्हें सब कुछ दूँगी।

राजा सुरथ ने वर माँगा माँ, अगले जन्म में मुझे ऐसा राज्य मिले जो कभी नष्ट न हो, और इस जन्म में शत्रुओं को हराकर मेरा अपना राज्य मुझे वापस मिल जाए। पर वैश्य समाधि का मन अब संसार से उदास हो चुका था। उन्होंने वर माँगा माँ, मुझे वह ज्ञान दीजिए, जो 'यह मेरा है' और 'मैं हूँ' इस आसक्ति को काट दे। देवी बोलीं राजन्, तुम थोड़े ही दिनों में अपने शत्रुओं को मारकर अपना राज्य पा लोगे।

वहाँ तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा। और मृत्यु के बाद, तुम सूर्य देव, यानी विवस्वान के अंश से फिर जन्म लोगे, और इस पृथ्वी पर सावर्णि नाम के मनु बनोगे आठवें मनु। और हे वैश्य-श्रेष्ठ, तुमने मुझसे जो वर माँगा है, वह मैं देती हूँ तुम्हें वह ज्ञान मिलेगा, जो मोक्ष की ओर ले जाता है। इस प्रकार दोनों को उनका मनचाहा वर देकर, भक्तिपूर्वक की गई स्तुति से प्रसन्न हुई देवी वहीं अंतर्धान हो गईं।

और क्षत्रियों में श्रेष्ठ राजा सुरथ, देवी से वरदान पाकर, सूर्य के अंश से जन्म लेकर सावर्णि मनु बने। यहीं श्री दुर्गा सप्तशती का तेरहवाँ अध्याय, और देवी माहात्म्य पूरा होता है। इस अंतिम कथा में एक गहरी बात है। एक ही माँ, एक ही तपस्या पर दो अलग वरदान।

राजा ने संसार माँगा, और उन्हें संसार मिला। वैश्य ने ज्ञान माँगा, और उन्हें मुक्ति का ज्ञान मिला। आज की सीख माँ हर भक्त को वही देती हैं, जो वह सच्चे मन से माँगता है। इसलिए यह ध्यान रखिए कि हम माँ से क्या माँग रहे हैं।

और ध्यान दीजिए राजा और वैश्य के पास न मंदिर था, न सोने की मूर्ति। नदी की मिट्टी से बनी एक छोटी सी प्रतिमा, और सच्ची भक्ति बस इतना ही काफ़ी था। पाठ की परंपरा में तेरहवें अध्याय के बाद देवी सूक्त, रहस्य-त्रय और क्षमा-प्रार्थना की जाती है 'अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया' माँ, दिन-रात मुझसे हज़ारों भूलें होती हैं, मुझे अपना दास समझकर क्षमा करना। यह वीडियो कथा को सरल हिंदी में समझाता है यह संस्कृत पाठ का विकल्प नहीं है।

पाठ की सही विधि अपनी परंपरा और प्रामाणिक पुस्तक, जैसे गीता प्रेस की दुर्गा सप्तशती, से ही करें। नौ दिनों में हमने साथ मिलकर पूरी दुर्गा सप्तशती की कथा सुनी मधु-कैटभ से सुरथ के वरदान तक। आप सबको नवरात्रि और विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ। जय माता दी।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। सुनने के लिए धन्यवाद। अगर यह वीडियो आपको अच्छा लगा, तो इसे अपने परिवार के साथ ज़रूर बाँटिए, और ऐसी ही पावन कथाओं के लिए जुड़े रहिए ज्योति यात्रा के साथ। भगवान की कृपा आप पर बनी रहे।

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