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🔱 12 ज्योतिर्लिंग यात्रा · भाग 2

सोमनाथ 🔱 प्रथम ज्योतिर्लिंग की अमर कथा, इतिहास और पूरी यात्रा गाइड

6:47 · 75 दर्शन · 1 दिन पहले

सोमनाथ 🔱 प्रथम ज्योतिर्लिंग की अमर कथा, इतिहास और पूरी यात्रा गाइड | 12 ज्योतिर्लिंग यात्रा

पूरी कथा पढ़ें

अरब सागर की लहरें जिस तट को सदियों से प्रणाम करती आई हैं, वहाँ खड़ा है भारत का प्रथम ज्योतिर्लिंग श्री सोमनाथ। गुजरात के सौराष्ट्र में, प्रभास पाटन की यह भूमि प्राचीन काल से प्रभास तीर्थ कहलाती है जहाँ कपिला, हिरण और सरस्वती नदियाँ मिलकर सागर में समा जाती हैं। शिव पुराण में द्वादश ज्योतिर्लिंगों की गणना सोमनाथ से ही आरंभ होती है। इसलिए इसे आदि ज्योतिर्लिंग भी कहा जाता है।

कथा है चंद्रदेव की। प्रजापति दक्ष ने अपनी सत्ताईस पुत्रियों का विवाह चंद्रमा से किया था जो आकाश के सत्ताईस नक्षत्र मानी जाती हैं। पर चंद्रमा का सारा प्रेम केवल रोहिणी के लिए था। बाकी बहनें उपेक्षित रह गईं, और उनका दुख पिता दक्ष तक पहुँचा।

दक्ष ने बार-बार समझाया, पर जब चंद्रमा नहीं माने, तो क्रोधित दक्ष ने शाप दे दिया तुम्हारा तेज क्षीण होता जाएगा। चंद्रमा की कांति घटने लगी। उनकी शीतल चाँदनी के बिना औषधियाँ मुरझाने लगीं, और संसार में उदासी छा गई। तब ब्रह्मा जी के कहने पर चंद्रदेव प्रभास क्षेत्र आए, और समुद्र तट पर शिवलिंग स्थापित कर कठोर तप करने लगे।

मान्यता है कि उन्होंने महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया। प्रसन्न होकर महादेव प्रकट हुए। शाप पूरी तरह मिट नहीं सकता था, पर शिव ने उसे वरदान में बदल दिया एक पक्ष में चंद्रमा घटेंगे, और दूसरे पक्ष में फिर बढ़ेंगे। यही है कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष का रहस्य।

और चंद्रमा को स्थान मिला स्वयं शिव के मस्तक पर इसलिए महादेव कहलाए चंद्रशेखर। चंद्रमा ने, जिनका एक नाम सोम है, अपने आराध्य से यहीं विराजने की प्रार्थना की। तभी से यह ज्योतिर्लिंग कहलाया सोमनाथ, अर्थात् सोम के नाथ। लोक-मान्यता है कि पहला मंदिर स्वयं सोम ने स्वर्ण से बनवाया, फिर रावण ने चाँदी से, श्रीकृष्ण ने चंदन से, और राजा भीमदेव ने पत्थर से।

इतिहास गवाह है सन् एक हज़ार छब्बीस में महमूद ग़ज़नवी के आक्रमण से लेकर, सदियों में यह मंदिर कई बार तोड़ा गया। पर हर बार आस्था ने इसे फिर से खड़ा किया। इसलिए सोमनाथ को कहते हैं अविनाशी आस्था का प्रतीक। स्वतंत्रता के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल के संकल्प से वर्तमान मंदिर का निर्माण हुआ, और सन् उन्नीस सौ इक्यावन में राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इसकी प्राण-प्रतिष्ठा की।

चालुक्य शैली में बना यह मंदिर, सोमपुरा शिल्पियों की कला का अद्भुत नमूना है। लगभग डेढ़ सौ फ़ीट ऊँचे शिखर पर स्वर्ण कलश और धर्मध्वजा लहराती है। समुद्र की ओर खड़ा है बाण-स्तंभ। उस पर लिखा संस्कृत लेख बताता है यहाँ से दक्षिण ध्रुव तक, सीधी रेखा में कोई भूखंड नहीं है।

मंदिर में प्रतिदिन तीन आरतियाँ होती हैं प्रातः सात बजे, दोपहर बारह बजे और संध्या सात बजे। घंटियों और शंखनाद से पूरा तट गूँज उठता है। रात में होता है प्रकाश और ध्वनि का कार्यक्रम, जिसमें मंदिर की दीवारों पर सोमनाथ की गाथा जीवंत हो उठती है। पास ही है त्रिवेणी संगम, जहाँ श्रद्धालु स्नान और पितृ-तर्पण करते हैं।

कुछ ही किलोमीटर दूर है भालका तीर्थ। मान्यता है कि यहीं जरा नामक शिकारी का बाण भगवान श्रीकृष्ण के चरण में लगा था। और हिरण नदी के तट पर देहोत्सर्ग तीर्थ है, जहाँ से श्रीकृष्ण ने निजधाम प्रस्थान किया ऐसा माना जाता है। अब बात यात्रा की।

निकटतम हवाई अड्डा केशोद है, लगभग पचपन किलोमीटर। नियमित उड़ानों के लिए राजकोट और दीव हवाई अड्डे भी विकल्प हैं। रेल से आएँ तो वेरावल जंक्शन लगभग छह-सात किलोमीटर दूर है, और सोमनाथ रेलवे स्टेशन मंदिर के और भी पास है। अहमदाबाद से दूरी लगभग चार सौ किलोमीटर है।

मंदिर के पास ट्रस्ट की पार्किंग है। मोबाइल, कैमरा और बैग मंदिर के भीतर नहीं ले जा सकते इन्हें लॉकर में जमा करना होता है। मंदिर के पीछे समुद्र किनारे बना है समुद्र दर्शन पथ शाम को यहाँ टहलते हुए लहरों और मंदिर का दृश्य मन मोह लेता है। भोजन में यहाँ की गुजराती थाली, ढोकला और फाफड़ा ज़रूर चखें।

ट्रस्ट के भोजनालय में सादा प्रसाद-भोजन भी मिलता है। दर्शन प्रातः छह से रात्रि दस बजे तक होते हैं। शालीन वस्त्र पहनें। अक्टूबर से मार्च का मौसम सबसे सुहावना है, और महाशिवरात्रि तथा कार्तिक पूर्णिमा पर विशेष उत्सव होता है।

ट्रस्ट के अतिथि-गृह, आरती और दर्शन की ताज़ा जानकारी के लिए श्री सोमनाथ ट्रस्ट की आधिकारिक वेबसाइट अवश्य देख लें। जहाँ चंद्रमा को नया जीवन मिला, जहाँ आस्था हर बार फिर से उठ खड़ी हुई वही है सोमनाथ। जय सोमनाथ। ॐ नमः शिवाय।

और यही है, ज्योति यात्रा।

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