🪔 Navratri 2026: Nine Goddesses, Nine Messages · Ep 17
Durga Saptashati Part 6: Chapters 9-10 (Nishumbha and Shumbha)
दुर्गा सप्तशती कथा भाग 6 🔱 अध्याय 9, 10 — निशुम्भ वध, शुम्भ वध, एकैवाहं | नवरात्रि दिन 6
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नमस्ते, ज्योति यात्रा में आपका स्वागत है। आज सुनिए पुराणों की एक ऐसी कथा, जो बहुत कम सुनाई जाती है। नवरात्रि का छठा दिन। श्री दुर्गा सप्तशती कथा का भाग छह।
आज अध्याय नौ और दस निशुम्भ और शुम्भ, दोनों महादैत्यों का अंत। नौवें अध्याय के ध्यान में अर्धनारीश्वर का स्वरूप है आधे शिव, आधी अंबिका। बंधूक पुष्प और स्वर्ण जैसी कांति, हाथों में अक्षमाला, पाश, अंकुश और वर-मुद्रा, तीन नेत्र, और मस्तक पर चंद्रमा की कला। राजा सुरथ ने कहा भगवन्, आपने रक्तबीज के वध की अद्भुत कथा सुनाई।
अब बताइए, उसके बाद अत्यंत क्रोधित शुम्भ और निशुम्भ ने क्या किया? महर्षि मेधा बोले — रक्तबीज के मारे जाने और सेना के नष्ट होने से शुम्भ और निशुम्भ क्रोध से भर उठे। निशुम्भ अपनी मुख्य सेना लेकर देवी पर टूट पड़ा, और उसके पीछे शुम्भ भी अपनी सेना के साथ आया। दोनों ओर से भयंकर युद्ध हुआ।
असुरों ने बाणों की ऐसी वर्षा की, जैसे बादल पानी बरसाते हैं। पर चंडिका ने अपने बाणों से उन सब बाणों को बीच में ही काट दिया। तब निशुम्भ ने तेज़ तलवार और चमकती ढाल लेकर देवी के सिंह के मस्तक पर प्रहार किया। देवी ने क्षुरप्र नाम के बाण से उसकी तलवार और ढाल, दोनों के टुकड़े कर दिए।
फिर उसने शक्ति फेंकी देवी ने चक्र से उसके दो टुकड़े कर दिए। उसने शूल चलाया देवी ने मुक्के से उसे चूर कर दिया। उसकी गदा देवी के त्रिशूल से भस्म हो गई, और फरसा लेकर आते ही देवी के बाणों से वह धरती पर गिर पड़ा। भाई को गिरा देखकर शुम्भ अत्यंत क्रोध से भरकर आगे बढ़ा।
रथ पर बैठा, आठ भुजाओं में आयुध लिए वह सारे आकाश में छा गया। तब देवी ने शंख बजाया, धनुष की टंकार की, और घंटे की ध्वनि से सब दिशाएँ भर दीं। उस नाद से असुरों का तेज मंद पड़ गया। सिंह की गर्जना और माँ काली के अट्टहास से धरती और आकाश काँप उठे।
शुम्भ ने जलती हुई शक्ति फेंकी, पर देवी के एक उल्का जैसे प्रहार से वह बुझ गई। शुम्भ के सारे बाण देवी ने काट दिए, और अपने त्रिशूल से उस पर प्रहार किया। शुम्भ मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़ा। उधर निशुम्भ को होश आ गया।
उसने धनुष उठाया, और फिर दस हज़ार भुजाएँ बनाकर हज़ारों चक्र एक साथ देवी पर चलाए। दुर्गतिनाशिनी दुर्गा ने उन सब चक्रों और बाणों को अपने बाणों से काट डाला। तब निशुम्भ गदा लेकर तेज़ी से चंडिका की ओर दौड़ा देवी ने उसकी गदा भी काट दी। जब वह फिर दौड़ा, तो देवी ने अपने शूल से उसके हृदय पर प्रहार किया।
उसके हृदय से एक और महाबली पुरुष निकला और बोला रुको! देवी ठहाका मारकर हँसीं, और अपनी तलवार से उसका भी अंत कर दिया। इस प्रकार निशुम्भ का वध हुआ। फिर सिंह, माँ काली और शिवदूती ने असुर सेना का संहार किया।
कौमारी की शक्ति, ब्रह्माणी के मंत्र-जल, माहेश्वरी के त्रिशूल, वाराही, वैष्णवी के चक्र और ऐन्द्री के वज्र से बची हुई असुर सेना नष्ट हो गई, या भाग गई। यहीं नौवाँ अध्याय पूरा होता है। दसवें अध्याय के ध्यान में कामेश्वरी देवी हैं तपे हुए सोने जैसी कांति, सूर्य, चंद्र और अग्नि रूपी तीन नेत्र, हाथों में धनुष, बाण, अंकुश, पाश और शूल, और मस्तक पर चंद्रमा की रेखा। महर्षि मेधा कहते हैं अपने प्राणों से प्यारे भाई निशुम्भ को मरा हुआ, और अपनी सारी सेना को नष्ट देखकर शुम्भ ने क्रोध में भरकर कहा — दुर्गे!
तू बल के घमंड में मत आ। तू तो दूसरी स्त्रियों के बल पर लड़ रही है, और फिर भी बड़ा अभिमान दिखा रही है। देवी बोलीं एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा। पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः॥ इस संसार में मैं अकेली ही हूँ, मेरे सिवा दूसरी कौन है?
रे दुष्ट, देख ये सब मेरी ही विभूतियाँ, मुझमें ही समा रही हैं। और उसी क्षण ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही, ऐन्द्री सब देवियाँ अंबिका के शरीर में लीन हो गईं। अब वहाँ केवल अंबिका अकेली थीं। देवी बोलीं मैं अपनी विभूतियों से अनेक रूपों में यहाँ उपस्थित थी।
उन सबको मैंने समेट लिया है। अब मैं अकेली ही युद्ध में खड़ी हूँ तुम भी स्थिर हो जाओ। फिर देवी और शुम्भ के बीच ऐसा भयंकर युद्ध हुआ, जिसे सब देवता और असुर देखते रह गए। देवी ने सैकड़ों बाणों और दिव्य अस्त्रों से उसके अस्त्र काट डाले, उसका धनुष तोड़ दिया, सारथी और घोड़े गिरा दिए।
अस्त्र-शस्त्र न रहने पर शुम्भ देवी को उठाकर आकाश में ले गया। वहाँ, बिना किसी आधार के, देवी और शुम्भ में बहुत देर तक मल्ल-युद्ध होता रहा ऐसा युद्ध, जिसने सिद्धों और मुनियों को भी विस्मित कर दिया। बहुत देर तक युद्ध के बाद अंबिका ने शुम्भ को ऊपर उठाया, घुमाया, और धरती पर पटक दिया। पर वह दुष्ट फिर भी मुक्का तानकर देवी को मारने के लिए दौड़ा।
तब देवी ने उसे अपने त्रिशूल से धरती पर गिरा दिया। उसके गिरते ही समुद्र, द्वीप और पर्वतों सहित सारी पृथ्वी काँप उठी। सब असुरों का स्वामी शुम्भ अब नहीं रहा। उस दुष्ट के मरते ही सारा संसार प्रसन्न और स्वस्थ हो गया।
आकाश निर्मल हो गया। उत्पात के बादल शांत हो गए, और नदियाँ अपने मार्ग में बहने लगीं। देवताओं का मन आनंद से भर गया। गंधर्व मधुर गीत गाने लगे, अप्सराएँ नाचने लगीं।
मंद, सुगंधित वायु बहने लगी, सूर्य की प्रभा उज्ज्वल हो गई, और यज्ञ की अग्नियाँ शांत भाव से जल उठीं। यहीं दसवाँ अध्याय पूरा होता है। इस कथा का सबसे बड़ा संदेश है एकैवाहं। सारी देवियाँ, सारी शक्तियाँ एक ही माँ हैं।
जिस रूप में भी हम उन्हें पुकारें, पहुँचती वही एक माँ हैं। आज की सीख शुम्भ और निशुम्भ को एक प्रचलित व्याख्या में अहंकार और ममता, यानी 'मैं' और 'मेरा' माना जाता है। ये दोनों सबसे अंत में हारते हैं, और इनके हारते ही मन का आकाश निर्मल हो जाता है। यह वीडियो कथा को सरल हिंदी में समझाता है यह संस्कृत पाठ का विकल्प नहीं है।
पाठ की विधि अपनी परंपरा और प्रामाणिक पुस्तक से ही करें। कल, भाग सात में अध्याय ग्यारह: देवताओं की नारायणी स्तुति सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके और देवी का वरदान। जय माता दी। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
सुनने के लिए धन्यवाद। अगर यह वीडियो आपको अच्छा लगा, तो इसे अपने परिवार के साथ ज़रूर बाँटिए, और ऐसी ही पावन कथाओं के लिए जुड़े रहिए ज्योति यात्रा के साथ। भगवान की कृपा आप पर बनी रहे।



