🪔 Navratri 2026: Nine Goddesses, Nine Messages · Ep 16
Durga Saptashati Part 5: Chapter 8 (The Seven Mothers, Raktabija)
दुर्गा सप्तशती कथा भाग 5 🔱 अध्याय 8 — सप्त मातृकाएँ, शिवदूती, रक्तबीज वध | नवरात्रि दिन 5
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नमस्ते, ज्योति यात्रा में आपका स्वागत है। आज सुनिए पुराणों की एक ऐसी कथा, जो बहुत कम सुनाई जाती है। नवरात्रि का पाँचवाँ दिन। श्री दुर्गा सप्तशती कथा का भाग पाँच।
आज अध्याय आठ सात मातृ-शक्तियों का प्रकट होना, और महादैत्य रक्तबीज का वध। इस अध्याय के ध्यान में माँ भवानी का अरुण, यानी उगते सूर्य जैसा लाल वर्ण है। उनकी आँखों में करुणा की लहरें हैं, हाथों में पाश, अंकुश, बाण और धनुष हैं, और अणिमा आदि सिद्धियाँ किरणों की तरह उन्हें घेरे हुए हैं। महर्षि मेधा कहते हैं चंड और मुंड के मारे जाने, और सेना के नष्ट होने की बात सुनकर असुरों का राजा शुम्भ क्रोध से भर गया।
उसने अपनी पूरी शक्ति झोंक देने की आज्ञा दी आज छियासी उदायुध, चौरासी कम्बु, पचास कोटिवीर्य, और सौ धौम्र कुलों के असुर अपनी सेनाओं के साथ युद्ध के लिए निकलें। कालक, दौर्हृद, मौर्य और कालकेय असुर भी मेरी आज्ञा से तुरंत युद्ध के लिए चलें। और फिर वह भयंकर शुम्भ हज़ारों बड़ी सेनाओं के साथ स्वयं भी निकला। उस भयंकर सेना को आते देखकर चंडिका ने अपने धनुष की टंकार से धरती और आकाश को भर दिया।
उनके सिंह ने ज़ोर से गर्जना की, और अंबिका ने घंटे की ध्वनि से उस नाद को और बढ़ा दिया। और माँ काली ने अपना मुख और भी फैला लिया। धनुष की टंकार, सिंह की गर्जना और घंटे की ध्वनि से चारों दिशाएँ गूँज उठीं। तभी देवताओं के कल्याण के लिए, और असुरों के विनाश के लिए, ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु और इंद्र की शक्तियाँ उन्हीं के रूप में, उन्हीं के वाहनों और आयुधों के साथ चंडिका के पास आ पहुँचीं।
हंस पर बैठी, हाथ में अक्षमाला और कमंडलु लिए ब्रह्मा जी की शक्ति ब्रह्माणी। बैल पर सवार, त्रिशूल लिए, मस्तक पर चंद्रमा महेश्वर की शक्ति माहेश्वरी। मोर पर बैठी, हाथ में शक्ति लिए कार्तिकेय की शक्ति कौमारी। गरुड़ पर सवार, शंख, चक्र, गदा, धनुष और खड्ग लिए विष्णु की शक्ति वैष्णवी।
यज्ञ-वराह का रूप लिए आईं वाराही, और नृसिंह जैसा रूप लिए नारसिंही, जिनके गर्दन के बालों के झटके से तारे बिखर जाते थे। और ऐरावत हाथी पर, हाथ में वज्र लिए इंद्र की शक्ति ऐन्द्री। फिर उन शक्तियों से घिरे महादेव ने चंडिका से कहा मेरी प्रसन्नता के लिए अब शीघ्र इन असुरों का संहार करो। तब देवी के शरीर से अत्यंत भयंकर चंडिका-शक्ति प्रकट हुईं, जो सैकड़ों सियारों की तरह नाद कर रही थीं।
उन्होंने भगवान शिव से कहा आप दूत बनकर शुम्भ-निशुम्भ के पास जाइए, और कहिए यदि जीवित रहना चाहते हो, तो इंद्र को तीनों लोक लौटा दो, देवताओं को उनका यज्ञ-भाग मिले, और तुम पाताल लौट जाओ। और यदि बल के घमंड में युद्ध करना चाहते हो, तो आओ मेरी शक्तियाँ तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हैं। क्योंकि उन देवी ने स्वयं शिव को दूत बनाकर भेजा, इसलिए वे संसार में शिवदूती नाम से प्रसिद्ध हुईं। पर अहंकारी असुरों ने यह संदेश नहीं माना।
वे क्रोध से भरकर, जहाँ कात्यायनी खड़ी थीं, उस ओर दौड़े, और बाणों, शक्तियों और भालों की वर्षा करने लगे। तब मातृ-शक्तियाँ असुरों पर टूट पड़ीं। ब्रह्माणी जहाँ-जहाँ अपने कमंडलु का जल छिड़कतीं, वहाँ असुरों का बल और पराक्रम नष्ट हो जाता। माहेश्वरी त्रिशूल से, वैष्णवी चक्र से, और कौमारी शक्ति से शत्रुओं को गिराने लगीं।
ऐन्द्री के वज्र से, वाराही के प्रहार से, और नारसिंही के नाखूनों से असुर सेना बिखर गई। शिवदूती के अट्टहास से ही असुर काँपकर धरती पर गिरने लगे। बचे हुए असुर भाग खड़े हुए। अपनी सेना को भागते देखकर महादैत्य रक्तबीज क्रोध से भरकर युद्ध के लिए आगे आया।
उसके पास एक अद्भुत वरदान था — जब भी उसके शरीर से रक्त की एक बूँद धरती पर गिरती, उस बूँद से उसी के समान बलवान एक नया रक्तबीज उत्पन्न हो जाता। ऐन्द्री ने उस पर वज्र से प्रहार किया। जितनी बूँदें गिरीं, उतने ही नए रक्तबीज खड़े हो गए सब वैसे ही बलवान, वैसे ही अस्त्र लिए। वैष्णवी ने चक्र चलाया, ऐन्द्री ने गदा, वाराही ने खड्ग, और माहेश्वरी ने त्रिशूल।
पर हर प्रहार के साथ असुरों की संख्या और बढ़ती गई। देखते ही देखते सारा संसार रक्तबीजों से भर गया। यह देखकर देवता अत्यंत भयभीत हो गए। तब उन्हें उदास देखकर चंडिका ने हँसते हुए माँ काली से कहा — चामुंडे, अपना मुख और फैला लो।
मेरे प्रहार से जो रक्त की बूँदें गिरें, और उनसे जो असुर उत्पन्न हों, उन्हें तुम धरती पर गिरने से पहले ही अपने मुख में ले लो। इस प्रकार इसका बल क्षीण होगा, और यह नष्ट होगा। फिर चंडिका ने रक्तबीज पर प्रहार किया, और माँ काली ने अपना विशाल मुख फैलाकर हर बूँद को धरती पर गिरने से पहले ही ग्रहण कर लिया। उनसे उत्पन्न होने वाले असुरों को भी वे अपने मुख में समेटती गईं।
अब कोई नया रक्तबीज जन्म नहीं ले पा रहा था। चंडिका ने शूल, वज्र, बाण और खड्ग से प्रहार किए, और अंत में शक्तिहीन होकर महादैत्य रक्तबीज धरती पर गिर पड़ा। रक्तबीज के गिरते ही देवताओं को अपार आनंद हुआ। और विजय के उल्लास में मातृ-शक्तियाँ आनंद से नृत्य करने लगीं।
यहीं आठवाँ अध्याय पूरा होता है। ध्यान दीजिए ये सारी शक्तियाँ अलग दिखती हैं, पर हैं एक ही माँ की। आगे दसवें अध्याय में देवी स्वयं कहेंगी इस संसार में मेरे सिवा दूसरा कौन है? आज की सीख रक्तबीज हमारे मन की उन बुरी इच्छाओं जैसा है, जो एक दबाओ तो दस और जन्म लेती हैं।
केवल लड़ने से वे कम नहीं होतीं। जैसे माँ काली ने हर बूँद को धरती पर गिरने से पहले ही रोक लिया, वैसे ही जागरूकता और भक्ति से बुरे विचार को जड़ पकड़ने से पहले ही रोक लिया जाए यही विजय का रास्ता है। यह वीडियो कथा को सरल हिंदी में समझाता है यह संस्कृत पाठ का विकल्प नहीं है। पाठ की विधि अपनी परंपरा और प्रामाणिक पुस्तक से ही करें।
कल, भाग छह में अध्याय नौ और दस: निशुम्भ और शुम्भ से देवी का अंतिम युद्ध। जय माता दी। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। सुनने के लिए धन्यवाद।
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