🪔 Navratri 2026: Nine Goddesses, Nine Messages · Ep 14
Durga Saptashati Part 3: Chapters 5-6 (Ya Devi Sarvabhuteshu, Dhumralochana)
दुर्गा सप्तशती कथा भाग 3 🔱 अध्याय 5, 6 — या देवी सर्वभूतेषु, धूम्रलोचन वध | नवरात्रि दिन 3
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नमस्ते, ज्योति यात्रा में आपका स्वागत है। आज सुनिए पुराणों की एक ऐसी कथा, जो बहुत कम सुनाई जाती है। नवरात्रि का तीसरा दिन। श्री दुर्गा सप्तशती कथा का भाग तीन।
आज से उत्तम चरित्र शुरू होता है इसकी देवता हैं महासरस्वती। आज अध्याय पाँच और छह की कथा। महर्षि मेधा राजा सुरथ से कहते हैं अब सुनो, कैसे वही देवी फिर से प्रकट हुईं, जब शुम्भ और निशुम्भ ने तीनों लोकों को अपने अधीन कर लिया। पाँचवाँ अध्याय।
पहले समय में शुम्भ और निशुम्भ नाम के दो महाबली असुर भाइयों ने अपने बल के घमंड में इंद्र से तीनों लोक छीन लिए, और यज्ञ के भाग भी हथिया लिए। उन्होंने सूर्य, चंद्रमा, कुबेर, यम और वरुण के अधिकार भी छीन लिए। वायु और अग्नि का काम भी वे स्वयं करने लगे। अपमानित और राज्यहीन देवताओं को तब देवी का वह वरदान याद आया जब-जब तुम संकट में मुझे याद करोगे, मैं तुम्हारी आपत्तियाँ दूर करूँगी।
सब देवता पर्वतराज हिमालय पर गए, और विष्णुमाया देवी की स्तुति करने लगे नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः। नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्॥ देवी को नमस्कार, महादेवी को नमस्कार, कल्याणमयी शिवा को सदा नमस्कार। प्रकृति और भद्रा को हमारा नमन। रौद्रा, नित्या और गौरी को नमन, ज्योत्स्ना, चंद्ररूपिणी और सुखरूपा देवी को बार-बार नमस्कार।
फिर देवताओं ने वह स्तुति गाई, जो आज हर देवी मंदिर में गूँजती है या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। जो देवी सब प्राणियों में विष्णुमाया कहलाती हैं उन्हें नमस्कार। जो सब प्राणियों में चेतना कहलाती हैं उन्हें नमस्कार। जो बुद्धि रूप में रहती हैं, जो निद्रा रूप में, और जो भूख के रूप में रहती हैं उन्हें बार-बार नमस्कार।
जो छाया रूप में, शक्ति रूप में, तृष्णा रूप में और क्षमा रूप में हर प्राणी में स्थित हैं। जो जाति, लज्जा, शांति और श्रद्धा के रूप में रहती हैं उन्हें नमस्कार। जो कांति रूप में, लक्ष्मी रूप में, वृत्ति रूप में और स्मृति रूप में हैं। जो दया रूप में और तुष्टि, यानी संतोष के रूप में हैं।
जो हर प्राणी में माता के रूप में स्थित हैं, और भ्रांति के रूप में भी उन देवी को नमस्कार, नमस्कार, बार-बार नमस्कार। इस स्तुति का भाव यह है माँ कहीं दूर नहीं हैं। हमारी बुद्धि, हमारी भूख, हमारी नींद, हमारी दया और माँ की ममता हर शक्ति में वही बसती हैं। जब देवता इस प्रकार स्तुति कर रहे थे, तभी माँ पार्वती गंगा जी में स्नान करने वहाँ आईं।
उन्होंने देवताओं से पूछा आप लोग यहाँ किसकी स्तुति कर रहे हैं? तभी उनके ही शरीर-कोश से एक दिव्य, शुभ रूप वाली देवी प्रकट हुईं, और बोलीं ये देवता मेरी ही स्तुति कर रहे हैं, क्योंकि शुम्भ ने इन्हें तिरस्कृत किया है, और निशुम्भ ने हराया है। पार्वती जी के शरीर-कोश से निकलने के कारण वे देवी कौशिकी कहलाईं अंबिका। और उनके निकलते ही पार्वती जी का वर्ण श्याम हो गया वे कालिका नाम से प्रसिद्ध हुईं, और हिमालय पर रहने लगीं।
उसी समय शुम्भ-निशुम्भ के दो सेवक, चंड और मुंड, वहाँ से गुज़रे। उन्होंने हिमालय के शिखर पर अत्यंत मनोहर रूप वाली अंबिका को देखा। वे दौड़कर शुम्भ के पास गए और बोले महाराज, हिमालय पर एक ऐसी स्त्री है, जिसकी सुंदरता के आगे सब फीका है। तीनों लोकों के रत्न आपके पास हैं इंद्र का ऐरावत हाथी, पारिजात वृक्ष, उच्चैःश्रवा घोड़ा, ब्रह्मा जी का विमान, कुबेर का खज़ाना और वरुण का छत्र।
तो यह स्त्री-रत्न भी आपके पास ही होना चाहिए, महाराज। यह सुनकर शुम्भ ने महादैत्य सुग्रीव को दूत बनाकर देवी के पास भेजा। सुग्रीव हिमालय पहुँचा और मीठी वाणी में बोला देवी, असुरों के राजा शुम्भ तीनों लोकों के स्वामी हैं। देवताओं के सारे रत्न उनके पास हैं।
उन्होंने कहा है कि तुम भी स्त्रियों में रत्न हो मुझे या मेरे भाई निशुम्भ को स्वीकार करो। देवी गंभीरता से मुस्कुराईं और बोलीं दूत, तुमने सच कहा। शुम्भ और निशुम्भ बड़े बलवान हैं। पर मैंने पहले, अल्प बुद्धि के कारण, एक प्रतिज्ञा कर रखी है।
उसे मैं झूठा कैसे करूँ? सुनो — यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति, यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति। — जो मुझे युद्ध में जीतेगा, जो मेरा अभिमान तोड़ेगा, जो संसार में मेरे बराबर बलवान हो वही मेरा स्वामी होगा। दूत बोला देवी, तुम घमंड से बात कर रही हो।
जिनके सामने इंद्र और सारे देवता नहीं टिक सके, उनके सामने तुम अकेली स्त्री कैसे जाओगी? देवी बोलीं बात तो ठीक है, पर प्रतिज्ञा तो प्रतिज्ञा है। जाकर अपने राजा से यही कह दो। छठा अध्याय।
दूत ने लौटकर सब बातें विस्तार से शुम्भ को बताईं। यह सुनकर असुरराज क्रोध से भर गया। उसने सेनापति धूम्रलोचन को आज्ञा दी धूम्रलोचन, अपनी सेना लेकर जाओ, और उस दुष्टा को बालों से पकड़कर, घसीटकर यहाँ ले आओ। यदि कोई उसकी रक्षा करने आए देवता, यक्ष या गंधर्व उसे मार डालना।
धूम्रलोचन साठ हज़ार असुरों की सेना लेकर हिमालय पहुँचा। उसने देवी को देखा और ऊँचे स्वर में कहा चल, मेरे स्वामी शुम्भ-निशुम्भ के पास चल। प्रेम से नहीं चलेगी, तो मैं तुझे बालों से पकड़कर घसीटता हुआ ले जाऊँगा। देवी बोलीं तुम्हें असुरों के राजा ने भेजा है, तुम स्वयं भी बलवान हो, और सेना भी साथ है।
यदि तुम मुझे बलपूर्वक ले जाओ, तो मैं क्या कर सकती हूँ? यह सुनकर धूम्रलोचन देवी की ओर झपटा। तब अंबिका ने केवल एक हुंकार भरी हुं! — और उसी क्षण धूम्रलोचन भस्म हो गया।
यह देखकर असुर सेना क्रोध से देवी पर तीखे बाणों, शक्तियों और फरसों की वर्षा करने लगी। तब देवी का सिंह क्रोध से गर्दन के बाल हिलाता हुआ, भयंकर गर्जना करके असुर सेना पर टूट पड़ा। देखते ही देखते सिंह ने पूरी असुर सेना को तितर-बितर कर दिया। धूम्रलोचन और उसकी सेना का अंत हो गया।
जब शुम्भ ने सुना कि धूम्रलोचन भस्म हो गया, और देवी के सिंह ने पूरी सेना नष्ट कर दी, तो वह क्रोध से काँपने लगा। उसने महादैत्य चंड और मुंड को आज्ञा दी बड़ी सेना लेकर जाओ, और उसे पकड़कर लाओ, या मार डालो। आज की सीख धूम्रलोचन का अर्थ है धुएँ जैसी आँखों वाला, यानी जिसकी दृष्टि धुंधली हो। जब हमारी दृष्टि अहंकार के धुएँ से धुंधली हो जाती है, तो माँ का एक 'हुं' ही उसे भस्म कर देता है।
और 'या देवी सर्वभूतेषु' याद दिलाता है माँ हर जीव में हैं, इसलिए हर जीव का आदर करें। कल, भाग चार में अध्याय सात: जब देवी के ललाट से माँ काली प्रकट होंगी, और चंड-मुंड का अंत करके वे चामुंडा कहलाएँगी। जय माता दी। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
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