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🪔 नवरात्रि 2026 — नौ देवी, नौ संदेश · भाग 15

दुर्गा सप्तशती कथा भाग 4 🔱 अध्याय 7 — माँ काली का प्राकट्य, चंड-मुंड वध, चामुंडा

6:28 · 1 घं॰ पहले

दुर्गा सप्तशती कथा भाग 4 🔱 अध्याय 7 — माँ काली का प्राकट्य, चंड-मुंड वध, चामुंडा | नवरात्रि दिन 4

पूरी कथा पढ़ें

नमस्ते, ज्योति यात्रा में आपका स्वागत है। आज सुनिए पुराणों की एक ऐसी कथा, जो बहुत कम सुनाई जाती है। नवरात्रि का चौथा दिन। श्री दुर्गा सप्तशती कथा का भाग चार।

आज अध्याय सात की कथा चंड और मुंड का वध, और वह क्षण, जब देवी के ललाट से माँ काली प्रकट हुईं। इस अध्याय के ध्यान में देवी का मातंगी स्वरूप है श्यामल अंग, रत्नों के आसन पर बैठी, एक चरण कमल पर रखे, मस्तक पर चंद्रमा की कला, हाथों में वीणा बजाती, और तोते की मधुर बोली सुनती हुई। ऐसी माँ का ध्यान करके कथा सुनें। महर्षि मेधा राजा सुरथ से कहते हैं शुम्भ की आज्ञा पाकर चंड और मुंड नाम के दैत्य, चतुरंगिणी सेना लेकर चल पड़े।

हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिक सबके हाथों में अस्त्र-शस्त्र। धनुष तने हुए, तलवारें चमकती हुईं। वह विशाल सेना हिमालय की ओर बढ़ी। वहाँ उन्होंने देवी को देखा हिमालय के एक बड़े स्वर्णिम शिखर पर, सिंह पर विराजमान, और मंद-मंद मुस्कुराती हुई।

देवी को देखते ही असुर उन्हें पकड़ने के लिए आगे बढ़े। कुछ ने धनुष ताने, कुछ तलवारें खींचकर उनकी ओर दौड़े। तब अंबिका को उन शत्रुओं पर भारी क्रोध आया। क्रोध से उनका मुख स्याही की तरह काला पड़ गया, और भौंहें टेढ़ी हो गईं।

और तभी, उनकी टेढ़ी भौंहों वाले ललाट से तुरंत एक देवी निकलीं भयंकर मुख वाली माँ काली, हाथों में तलवार और पाश लिए। भ्रुकुटीकुटिलात्तस्या ललाटफलकाद्द्रुतम्। काली करालवदना विनिष्क्रान्तासिपाशिनी॥ उनके हाथ में विचित्र खट्वांग था, गले में मुंडों की माला, और शरीर पर बाघ की खाल। उनका शरीर सूखा और भयानक था, मुँह बहुत बड़ा, जीभ बाहर लपलपाती हुई, और आँखें लाल और भीतर धँसी हुई।

माँ काली ने ऐसी भयंकर गर्जना की कि दसों दिशाएँ गूँज उठीं। और वे बड़े वेग से असुरों की उस सेना पर टूट पड़ीं। देखते ही देखते उन्होंने हाथियों, घोड़ों, रथों और सारथियों सहित असुरों के बड़े-बड़े योद्धाओं को अपने विशाल मुख में समेटना शुरू कर दिया। जिस शक्ति को देवता नहीं रोक सके, वह माँ के सामने कुछ भी नहीं थी।

किसी को उन्होंने तलवार से गिराया, किसी को खट्वांग से, और कितने ही असुर उनकी गर्जना सुनकर ही भाग खड़े हुए। पल भर में असुर सेना बिखर गई। अपनी सेना का ऐसा हाल देखकर चंड बड़े क्रोध से माँ काली की ओर दौड़ा। उसने उन पर भयंकर बाणों की वर्षा कर दी।

और मुंड ने हज़ारों चक्र फेंके। वे चमकते हुए चक्र जब माँ काली के मुख में समा रहे थे, तो ऐसा लगता था जैसे बहुत से सूर्य किसी काले बादल के भीतर समा रहे हों। तब माँ काली ने बड़े भयानक स्वर में अट्टहास किया। उनके दाँत चमक उठे, और क्रोध से उनका तेज और भी बढ़ गया।

वे देवी के सिंह पर सवार होकर चंड की ओर झपटीं, उसके केश पकड़े, और अपनी तलवार से उसका अंत कर दिया। चंड को गिरा देखकर मुंड भी उनकी ओर दौड़ा। माँ ने क्रोध में भरकर अपनी तलवार से उसे भी धरती पर गिरा दिया। सेनापति चंड और महाबली मुंड का अंत देखकर बची हुई असुर सेना भय से व्याकुल होकर चारों दिशाओं में भाग गई।

फिर माँ काली चंड और मुंड को लेकर चंडिका के पास आईं, और प्रचंड अट्टहास के साथ बोलीं इस युद्ध-यज्ञ में चंड और मुंड, ये दोनों महापशु मैंने तुम्हें भेंट किए। अब शुम्भ और निशुम्भ का वध तुम स्वयं करोगी। तब कल्याणमयी चंडिका ने मधुर वाणी में माँ काली से कहा क्योंकि तुम चंड और मुंड को पकड़कर लाई हो, इसलिए संसार में तुम चामुंडा नाम से प्रसिद्ध होगी। यस्माच्चण्डं च मुण्डं च गृहीत्वा त्वमुपागता।

चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवी भविष्यसि॥ यही है चामुंडा नाम की कथा। यहीं सातवाँ अध्याय पूरा होता है। देवताओं को फिर आशा मिली, क्योंकि जो माँ एक हुंकार से धूम्रलोचन को भस्म कर सकती हैं, और जिनके ललाट से काली प्रकट होती हैं उनके सामने कोई अहंकार टिक नहीं सकता। यही कारण है कि नवार्ण मंत्र में माँ को चामुंडा कहकर पुकारा जाता है ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।

और देश भर में चामुंडा माता के अनेक प्राचीन मंदिर इसी नाम का स्मरण कराते हैं। कथा में एक बात ध्यान देने वाली है काली कोई अलग शक्ति नहीं हैं। वे अंबिका के ही क्रोध से, उनके ही ललाट से प्रकट होती हैं। माँ का कोमल रूप और माँ का प्रचंड रूप दोनों एक ही हैं।

आज की सीख एक प्रचलित आध्यात्मिक व्याख्या में चंड को प्रचंड क्रोध, और मुंड को जड़ता माना जाता है, यानी सोई हुई बुद्धि। ये दोनों हमारे भीतर भी हैं। जब हम माँ को पुकारते हैं, तो वही शक्ति हमारे भीतर के क्रोध और आलस्य को हराती है। माँ का भयंकर रूप भक्त को डराने के लिए नहीं, उसकी रक्षा के लिए है।

यह वीडियो कथा को सरल हिंदी में समझाता है यह संस्कृत पाठ का विकल्प नहीं है। पाठ की विधि अपनी परंपरा और प्रामाणिक पुस्तक से ही करें। कल, भाग पाँच में अध्याय आठ: रक्तबीज की कथा, जिसकी हर बूँद से नया असुर जन्म लेता था, और कैसे माँ चामुंडा ने उसे जीता। जय माता दी।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। सुनने के लिए धन्यवाद। अगर यह वीडियो आपको अच्छा लगा, तो इसे अपने परिवार के साथ ज़रूर बाँटिए, और ऐसी ही पावन कथाओं के लिए जुड़े रहिए ज्योति यात्रा के साथ। भगवान की कृपा आप पर बनी रहे।

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