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🪔 नवरात्रि 2026 — नौ देवी, नौ संदेश · भाग 18

दुर्गा सप्तशती कथा भाग 7 🔱 अध्याय 11 — नारायणी स्तुति, सर्वमंगल मांगल्ये

9:23 · 5 दर्शन · 1 घं॰ पहले

दुर्गा सप्तशती कथा भाग 7 🔱 अध्याय 11 — नारायणी स्तुति, सर्वमंगल मांगल्ये | नवरात्रि दिन 7

पूरी कथा पढ़ें

नमस्ते, ज्योति यात्रा में आपका स्वागत है। आज सुनिए पुराणों की एक ऐसी कथा, जो बहुत कम सुनाई जाती है। नवरात्रि का सातवाँ दिन। श्री दुर्गा सप्तशती कथा का भाग सात।

आज अध्याय ग्यारह देवताओं की नारायणी स्तुति, और देवी का वह वचन, जो युगों-युगों का भरोसा है। इस अध्याय के ध्यान में माँ भुवनेश्वरी हैं उगते सूर्य जैसी कांति, मस्तक पर चंद्रमा का मुकुट, तीन नेत्र, मुस्कुराता मुख, और हाथों में वर, अंकुश, पाश और अभय मुद्रा। महर्षि मेधा कहते हैं शुम्भ के मारे जाने पर, अग्निदेव को आगे करके इंद्र आदि देवता कात्यायनी देवी की स्तुति करने लगे। अपनी मनोकामना पूरी होने से उनके मुख-कमल खिल उठे थे, और दिशाएँ प्रकाश से भर गई थीं।

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य। प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य॥ शरण में आए लोगों का दुख हरने वाली देवी, प्रसन्न हो। सारे जगत की माता, प्रसन्न हो। विश्वेश्वरी, विश्व की रक्षा करो तुम ही चर और अचर, सबकी स्वामिनी हो।

तुम ही इस जगत का एकमात्र आधार हो, क्योंकि पृथ्वी के रूप में तुम ही स्थित हो। जल के रूप में तुम ही इस सबको तृप्त करती हो। तुम ही वैष्णवी शक्ति हो, अनंत पराक्रम वाली इस विश्व का बीज, परम माया। सारी विद्याएँ तुम्हारे ही भेद हैं, और संसार की सारी स्त्रियाँ तुम्हारा ही रूप हैं।

एक तुम ही इस जगत में व्याप्त हो, माँ तुम्हारी स्तुति कोई कैसे करे? और फिर गूँजी वह स्तुति, जो आज हर पूजा के अंत में गाई जाती है सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥ जो सारे मंगलों का भी मंगल हैं, जो कल्याणमयी शिवा हैं, जो सबके सारे प्रयोजन सिद्ध करती हैं, जो शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी हैं उन नारायणी को नमस्कार। सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि।

गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते॥ जो सृष्टि, पालन और संहार की शक्ति हैं, सनातन हैं, जो तीनों गुणों का आधार हैं, और स्वयं गुणमयी हैं नारायणी, तुम्हें नमस्कार। शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे। सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥ जो शरण में आए दीनों और दुखियों की रक्षा में सदा लगी रहती हैं, जो सबकी पीड़ा हरती हैं नारायणी, तुम्हें नमस्कार। फिर देवताओं ने हर शक्ति को अलग से प्रणाम किया हंस वाले विमान पर बैठी, कुश-मिश्रित जल छिड़कने वाली ब्रह्माणी को।

त्रिशूल, चंद्रमा और सर्प धारण करने वाली, बैल पर सवार माहेश्वरी को। मोर और मुर्गे से घिरी, शक्ति धारण करने वाली कौमारी को। शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग धनुष धारण करने वाली वैष्णवी को। भयंकर चक्र लेकर पृथ्वी को अपने दाँतों पर उठाने वाली वाराही को।

नृसिंह रूप वाली नारसिंही को। मुकुट और महावज्र धारण करने वाली, हज़ार नेत्रों वाली ऐन्द्री को सबको नमस्कार। शिवदूती रूप से दैत्यों की महासेना का संहार करने वाली देवी को, और भयंकर मुख वाली, मुंडमाला से सुशोभित चामुंडा को हे नारायणी, तुम्हें नमस्कार। सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।

भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥ सब रूपों वाली, सबकी स्वामिनी, सारी शक्तियों से युक्त दुर्गा देवी हमें सब भयों से बचाओ, तुम्हें नमस्कार। देवताओं ने कहा माँ, प्रसन्न होने पर तुम सब रोगों को नष्ट कर देती हो, और रुष्ट होने पर सारी मनचाही कामनाओं को। जो तुम्हारी शरण में जाते हैं, उन पर विपत्ति आती ही नहीं बल्कि वे स्वयं दूसरों को शरण देने वाले बन जाते हैं। सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।

एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥ हे सबकी स्वामिनी, इसी प्रकार तुम तीनों लोकों की सारी बाधाएँ शांत करती रहो, और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो। तब देवी प्रसन्न होकर बोलीं देवताओ, मैं वर देने को तैयार हूँ। संसार के उपकार के लिए तुम जो भी वर माँगना चाहो, माँग लो मैं दूँगी। देवताओं ने कहा माँ, इसी प्रकार तुम तीनों लोकों की सारी बाधाएँ दूर करती रहो।

जब भी हम संकट में हों, तुम हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो। देवी बोलीं वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाईसवें युग में शुम्भ और निशुम्भ फिर जन्म लेंगे। तब मैं नंद गोप के घर, यशोदा के गर्भ से जन्म लूँगी, और विंध्याचल पर्वत पर रहकर उन दोनों का नाश करूँगी। फिर पृथ्वी पर वैप्रचित्ति नाम के दानवों का अत्याचार होगा।

तब मैं अत्यंत भयंकर रूप में अवतार लेकर उनका नाश करूँगी। उस समय मेरे दाँत अनार के फूल जैसे लाल हो जाएँगे इसलिए लोग मुझे रक्तदंतिका कहेंगे। फिर जब सौ वर्षों तक वर्षा नहीं होगी, और धरती पर अन्न-जल का अकाल पड़ेगा, तब मुनियों की स्तुति से मैं अयोनिजा रूप में प्रकट होऊँगी। सौ नेत्रों से मुनियों को देखूँगी इसलिए शताक्षी कहलाऊँगी।

और अपने शरीर से उत्पन्न शाक, यानी साग-सब्ज़ियों और अन्न से सारे संसार का पालन करूँगी, जब तक वर्षा न हो। तब मैं शाकम्भरी नाम से प्रसिद्ध होऊँगी। उसी समय दुर्गम नाम के महादैत्य का वध करके मैं दुर्गा कहलाऊँगी। फिर जब मैं भयंकर रूप धारण करके हिमालय पर मुनियों की रक्षा के लिए राक्षसों का नाश करूँगी, तब मुनि मुझे भीमा देवी कहकर पुकारेंगे।

और जब अरुण नाम का दैत्य तीनों लोकों को सताएगा, तब मैं असंख्य भौंरों का रूप धारण करके उसका नाश करूँगी तब लोग मुझे भ्रामरी कहेंगे। इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति। तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम्॥ इस प्रकार जब-जब दानवों के कारण संसार में बाधा होगी, तब-तब मैं अवतार लेकर शत्रुओं का नाश करूँगी। यहीं ग्यारहवाँ अध्याय पूरा होता है।

यह माँ का वह वचन है, जो हर भक्त के मन को भरोसा देता है मैं हूँ, और जब-जब ज़रूरत होगी, मैं आऊँगी। आज की सीख नारायणी स्तुति में देवता माँ से धन या राज्य नहीं, बस इतना माँगते हैं कि संसार की बाधाएँ दूर हों। सच्ची प्रार्थना वही है, जो सबके कल्याण के लिए हो। आज पूजा के अंत में आप भी सर्वमंगल मांगल्ये का पाठ कीजिए, और माँ से सबके मंगल की प्रार्थना कीजिए।

यह वीडियो कथा को सरल हिंदी में समझाता है यह संस्कृत पाठ का विकल्प नहीं है। कल, भाग आठ में अध्याय बारह: देवी स्वयं बताएँगी कि इस माहात्म्य के पाठ और श्रवण से क्या फल मिलता है। जय माता दी। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।

सुनने के लिए धन्यवाद। अगर यह वीडियो आपको अच्छा लगा, तो इसे अपने परिवार के साथ ज़रूर बाँटिए, और ऐसी ही पावन कथाओं के लिए जुड़े रहिए ज्योति यात्रा के साथ। भगवान की कृपा आप पर बनी रहे।

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