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🪔 नवरात्रि 2026 — नौ देवी, नौ संदेश · भाग 7

नवरात्रि दिन 7 🔱 माँ कालरात्रि की कथा, मंत्र और पूजा विधि

4:21 · 1 घं॰ पहले

नवरात्रि दिन 7 🔱 माँ कालरात्रि की कथा, मंत्र और पूजा विधि | नौ देवी, नौ संदेश

पूरी कथा पढ़ें

आज नवरात्रि का सातवाँ दिन है माँ कालरात्रि का। नौ रूपों में सबसे उग्र दिखने वाला रूप, पर भक्तों के लिए सबसे करुणामय। काल यानी समय, और रात्रि यानी रात। जो काल का भी अंत कर दें, जो अज्ञान की अंधेरी रात को मिटा दें वे हैं कालरात्रि।

उनका वर्ण घने अंधकार जैसा है, बाल खुले हुए, और तीन नेत्र। उनकी चार भुजाएँ हैं एक हाथ में खड्ग, एक में लोहे का कांटा, और बाकी दो हाथ अभय और वरमुद्रा में। उनका वाहन गधा है मान्यता है, यह बताने के लिए कि माँ की कृपा के लिए कोई छोटा या बड़ा नहीं। सबसे साधारण भी उनका प्रिय है।

कथा है शुंभ और निशुंभ नाम के असुरों ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। देवताओं ने हिमालय पर जाकर माँ पार्वती से प्रार्थना की। मान्यता है कि तब देवी ने अपना स्वर्णिम रूप त्यागा, और उनका श्याम, तेजस्वी रूप प्रकट हुआ। यही रूप कालरात्रि के नाम से पूजा जाता है।

युद्ध में एक असुर था रक्तबीज। उसे वरदान था कि उसकी एक बूँद भी धरती पर गिरे, तो उससे एक नया रक्तबीज पैदा हो जाए। सेना बढ़ती ही जा रही थी। तब माँ के उस श्याम रूप ने एक भी बूँद धरती पर गिरने नहीं दी।

देखते ही देखते असुरों की पूरी परछाई जैसी सेना मिट गई, और रक्तबीज का अंत हुआ। दुर्गा सप्तशती में यह कथा देवी के अनेक रूपों के साथ आती है। संदेश यही जो बुराई अपने आप बढ़ती जाती है, उसे जड़ से मिटाना पड़ता है। माँ कालरात्रि का एक नाम है शुभंकरी।

यानी हमेशा शुभ करने वाली। उनका रूप भले भयंकर लगे, पर अपने भक्तों के लिए वे केवल माँ हैं। योग परंपरा में कई जगह उन्हें सहस्रार चक्र से जोड़ा जाता है सिर के शिखर का केंद्र, जहाँ साधक का मन पूरी तरह भय से मुक्त हो जाता है। दुर्गा सप्तशती के अर्गला स्तोत्र में माँ की स्तुति है जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥ अर्थ विजय देने वाली, मंगल करने वाली, काली, भद्रकाली, दुर्गा, क्षमा, शिवा, सबको धारण करने वाली हे देवी, आपको नमस्कार है। उनका नाम-मंत्र है ॐ देवी कालरात्र्यै नमः। इसे एक माला, यानी एक सौ आठ बार, शांत मन से जपा जा सकता है। आज का संदेश अंधेरे से डरिए मत।

हर रात के बाद सुबह आती है। और अंधेरा जितना गहरा हो, दीये की लौ उतनी ही साफ़ दिखती है। हम सबके भीतर कोई न कोई डर है असफलता का, अकेलेपन का, भविष्य का। माँ कालरात्रि सिखाती हैं डर का सामना करो, तो वह छोटा होने लगता है।

और जब मन बहुत घबराए, तो बस इतना याद रखिए माँ का एक हाथ हमेशा अभय मुद्रा में है। मत डरो, मैं हूँ। पूजा में माँ को गुड़ का भोग लगाने की परंपरा है, और रात में खिलने वाली चमेली प्रिय मानी जाती है। कई जगह इस दिन स्लेटी, यानी ग्रे रंग पहनना शुभ माना जाता है।

पर याद रखिए माँ भाव से प्रसन्न होती हैं, सामग्री से नहीं। आज रात एक दीया जलाइए, और अपने किसी एक डर को माँ के चरणों में छोड़ दीजिए। या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। कल अष्टमी पर मिलेंगे माँ महागौरी के साथ।

ज्योति यात्रा से जुड़े रहिए जय माता दी।

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