🪔 नवरात्रि 2026 — नौ देवी, नौ संदेश · भाग 13
दुर्गा सप्तशती कथा भाग 2 🔱 अध्याय 2, 3, 4 — महिषासुर वध
दुर्गा सप्तशती कथा भाग 2 🔱 अध्याय 2, 3, 4 — महिषासुर वध | नवरात्रि दिन 2 | Durga Saptashati
पूरी कथा पढ़ें
नमस्ते, ज्योति यात्रा में आपका स्वागत है। आज सुनिए पुराणों की एक ऐसी कथा, जो बहुत कम सुनाई जाती है। नवरात्रि का दूसरा दिन। श्री दुर्गा सप्तशती कथा का भाग दो।
कल हमने प्रथम चरित्र सुना मधु और कैटभ का अंत। आज मध्यम चरित्र अध्याय दो, तीन और चार। इसकी देवता हैं महालक्ष्मी। महर्षि मेधा राजा सुरथ और समाधि वैश्य से आगे कहते हैं अब सुनो, कैसे सारे देवताओं के तेज से वह देवी प्रकट हुईं, जिन्होंने महिषासुर का अंत किया।
दूसरा अध्याय। बहुत पहले, देवताओं और असुरों के बीच पूरे सौ वर्षों तक युद्ध हुआ। असुरों का स्वामी था महिषासुर, और देवताओं के नायक थे इंद्र। उस युद्ध में देवताओं की सेना हार गई।
सारे देवताओं को जीतकर महिषासुर स्वयं इंद्र बन बैठा, और स्वर्ग पर राज करने लगा। हारे हुए देवता स्वर्ग से निकाल दिए गए, और साधारण मनुष्यों की तरह पृथ्वी पर भटकने लगे। तब सब देवता प्रजापति ब्रह्मा जी को आगे करके वहाँ पहुँचे, जहाँ भगवान शिव और भगवान विष्णु विराजमान थे। उन्होंने अपना दुख सुनाया प्रभु, महिषासुर ने सूर्य, इंद्र, अग्नि, वायु, चंद्रमा, यम और वरुण सबके अधिकार छीन लिए हैं।
हम आपकी शरण में आए हैं, उसके वध का उपाय सोचिए। देवताओं की बात सुनकर भगवान विष्णु और शिव को बड़ा क्रोध आया। उनकी भौंहें तन गईं, मुख टेढ़े हो गए। तब अत्यंत क्रोध से भरे विष्णु के मुख से एक महान तेज निकला।
फिर ब्रह्मा और शिव के मुख से भी तेज निकला। इंद्र और सभी देवताओं के शरीर से भी तेज निकला और वह सब मिलकर एक हो गया। वह तेज का पुंज ऐसा था, जैसे कोई जलता हुआ पर्वत हो। उसकी ज्वालाएँ सब दिशाओं में फैल रही थीं।
और वह तेज, जो सारे देवताओं के शरीर से निकला था, एक दिव्य नारी के रूप में बदल गया उसके प्रकाश से तीनों लोक जगमगा उठे। शिव के तेज से देवी का मुख बना, यमराज के तेज से केश, विष्णु के तेज से भुजाएँ। चंद्रमा से वक्ष, इंद्र से कमर, वरुण से जंघाएँ, और पृथ्वी के तेज से नितंब बने। ब्रह्मा के तेज से चरण, सूर्य से पैरों की उँगलियाँ, वसुओं से हाथ की उँगलियाँ, और कुबेर से नासिका बनी।
प्रजापति से दाँत, अग्नि से तीनों नेत्र, संध्या से भौंहें और वायु से कान बने। इस प्रकार सब देवताओं के तेज से कल्याणमयी देवी प्रकट हुईं। अब देवताओं ने उन्हें अपने-अपने अस्त्र दिए। भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से एक त्रिशूल निकालकर दिया, और विष्णु ने अपने चक्र से एक चक्र।
वरुण ने शंख दिया, अग्नि ने शक्ति, और वायु ने धनुष तथा बाणों से भरे दो तरकश। देवराज इंद्र ने अपने वज्र से एक वज्र दिया, और ऐरावत हाथी का घंटा। यमराज ने कालदंड दिया, वरुण ने पाश, प्रजापति ने स्फटिक की माला और ब्रह्मा जी ने कमंडल। सूर्य ने देवी के रोम-रोम में अपनी किरणें भर दीं।
काल ने चमकती तलवार और ढाल दी। क्षीरसागर ने उज्ज्वल हार, कभी पुराने न होने वाले दिव्य वस्त्र, चूड़ामणि, कुंडल, कंगन, अर्धचंद्र, बाजूबंद, नूपुर और अँगूठियाँ दीं। विश्वकर्मा ने फरसा और अभेद्य कवच दिया, समुद्र ने कभी न मुरझाने वाली कमलों की माला, और हिमालय ने सवारी के लिए सिंह और अनेक रत्न दिए। कुबेर ने एक दिव्य पान-पात्र दिया, और शेषनाग ने मणियों से सजा नागहार।
इस प्रकार सम्मानित होकर देवी ने ऊँचे स्वर में अट्टहास किया। उस भयंकर नाद से पूरा आकाश भर गया, पृथ्वी डोलने लगी, समुद्र उफन पड़े और पर्वत हिल उठे। देवताओं ने प्रसन्न होकर सिंहवाहिनी देवी की जय-जयकार की। ऋषियों ने भक्ति से सिर झुकाकर उनकी स्तुति की।
तीनों लोकों को काँपते देख, असुर अपनी सेनाएँ लेकर उठ खड़े हुए। महिषासुर क्रोध से बोला यह क्या है? और वह असंख्य असुरों के साथ उस नाद की ओर दौड़ पड़ा। उसने देवी को देखा वे अपनी प्रभा से तीनों लोकों को प्रकाशित कर रही थीं।
उनके चरणों के भार से पृथ्वी दबी जा रही थी, मुकुट आकाश को छू रहा था, धनुष की टंकार से पाताल तक हिल रहा था, और उनकी हज़ारों भुजाएँ सब दिशाओं में फैली थीं। फिर युद्ध शुरू हुआ। महिषासुर का सेनापति चिक्षुर लड़ने आया, चामर अपनी चतुरंगिणी सेना लेकर आया। उदग्र साठ हज़ार रथों के साथ, महाहनु एक करोड़ रथों के साथ, असिलोमा पाँच करोड़ और बाष्कल साठ लाख रथों के साथ युद्ध में उतरा।
परिवारित, बिडाल और अनगिनत दूसरे महादैत्य भी हाथी, घोड़े और रथों की विशाल सेनाएँ लेकर आए। उन्होंने देवी पर तलवारें, फरसे, भाले और मूसल बरसाए। पर देवी ने खेल-खेल में उन सबके अस्त्र काट दिए। युद्ध करते हुए देवी जो साँसें लेतीं, उनसे सैकड़ों-हज़ारों गण प्रकट हो जाते वे ढोल, शंख और मृदंग बजाते हुए असुरों से लड़ने लगे।
देवी ने त्रिशूल, गदा, शक्ति और तलवार से सैकड़ों असुरों का संहार किया। देवी का सिंह भी गर्दन के बाल हिलाता हुआ, जंगल की आग की तरह असुर सेना में घूमने लगा। इस प्रकार दूसरे अध्याय में महिषासुर की सेना का अंत हुआ। तीसरा अध्याय।
अपनी सेना को नष्ट होते देख, सेनापति चिक्षुर क्रोध से भरकर आगे बढ़ा, और देवी पर बाणों की वर्षा करने लगा, जैसे बादल मेरु पर्वत पर पानी बरसाते हैं। देवी ने अपने बाणों से उसके बाण काट दिए। फिर उसके घोड़ों और सारथी को मार गिराया, उसका धनुष और ध्वजा काट दी। चिक्षुर तलवार और ढाल लेकर दौड़ा उसकी तलवार देवी से टकराकर टुकड़े-टुकड़े हो गई।
अंत में देवी की शक्ति के प्रहार से वह धराशायी हो गया। तब चामर हाथी पर सवार होकर आया। उसने देवी पर शक्ति फेंकी देवी ने एक हुंकार से उसे बेकार कर दिया। फिर देवी का सिंह उछलकर हाथी के मस्तक पर जा चढ़ा, और चामर से भिड़ गया।
दोनों धरती पर गिरे, और सिंह ने चामर का अंत कर दिया। फिर एक-एक करके महादैत्य आए और गिरे उदग्र, कराल, उद्धत, बाष्कल, ताम्र और अंधक, उग्रास्य, उग्रवीर्य और महाहनु, बिडाल, दुर्धर और दुर्मुख। देवी ने किसी को गदा से, किसी को त्रिशूल से, किसी को बाणों से परास्त किया। अपनी सेना और सेनापतियों का अंत देखकर महिषासुर स्वयं भैंसे के रूप में आया।
उसने खुरों, सींगों, पूँछ और साँसों से देवी के गणों को गिराना शुरू किया। उसके खुरों से धरती फटने लगी, सींगों से पहाड़ उछलने लगे, और उसकी साँसों से बादल छिन्न-भिन्न हो गए। वह सीधे देवी के सिंह की ओर झपटा। यह देखकर जगदंबा को बड़ा क्रोध आया।
देवी ने उस पर पाश फेंककर उसे बाँध लिया। तब उसने भैंसे का रूप छोड़ दिया, और सिंह बन गया। देवी ने जैसे ही सिंह का सिर काटा, वह तलवार लिए एक पुरुष बन गया। देवी ने बाणों से उस पुरुष को काटा, तो वह विशाल हाथी बन गया।
हाथी अपनी सूँड़ से देवी के सिंह को खींचने लगा। देवी ने तलवार से उसकी सूँड़ काट दी। तब उस महादैत्य ने फिर से भैंसे का रूप धारण कर लिया, और तीनों लोकों को व्याकुल करने लगा। तब क्रोध से भरी जगन्माता चंडिका ने बार-बार दिव्य पान-पात्र से मधु पिया, और हँसने लगीं।
उनके नेत्र लाल हो उठे। उधर बल और पराक्रम के घमंड में चूर वह असुर गरजने लगा, और अपने सींगों से देवी की ओर पर्वत फेंकने लगा। देवी ने अपने बाणों से उन पर्वतों को चूर-चूर कर दिया। देवी बोलीं गर्ज गर्ज क्षणं मूढ, मधु यावत् पिबाम्यहम्।
अरे मूर्ख, जब तक मैं मधु पी रही हूँ, तब तक क्षण भर गरज ले। जब मैं तुझे यहीं मार दूँगी, तब शीघ्र ही देवता गरजेंगे। यह कहकर देवी उछलीं, और उस महादैत्य पर चढ़ गईं। उन्होंने अपने पैर से उसकी गर्दन दबाई, और शूल से प्रहार किया।
देवी के पैर से दबा वह असुर अपने ही मुख से आधा बाहर निकला, और आधे रूप में भी लड़ने लगा। तब देवी ने अपनी विशाल तलवार से उसका सिर काट गिराया। महिषासुर का अंत हुआ। हाहाकार करती हुई उसकी बची हुई सेना भाग खड़ी हुई।
सारे देवता आनंद से भर गए। देवताओं और महर्षियों ने देवी की स्तुति की, गंधर्वों ने गान किया और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। इस प्रकार तीसरे अध्याय में महिषासुर का वध पूरा हुआ। चौथा अध्याय शक्रादि स्तुति।
महिषासुर और उसकी सेना के मारे जाने पर इंद्र आदि देवताओं ने सिर और कंधे झुकाकर, रोमांचित होकर, सुंदर वचनों में देवी की स्तुति की। देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या जिन देवी ने अपनी शक्ति से यह सारा संसार व्याप्त कर रखा है, जो सारे देवताओं की शक्ति का समूह हैं, उन अंबिका को हम भक्ति से नमस्कार करते हैं। वे हमारा कल्याण करें। जिनके अतुलनीय प्रभाव और बल का वर्णन भगवान विष्णु, ब्रह्मा और शिव भी नहीं कर सकते वे चंडिका सारे जगत का पालन करें, और अशुभ के भय का नाश करें।
या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः जो पुण्यात्माओं के घरों में स्वयं लक्ष्मी बनकर रहती हैं, और पापियों के घरों में दरिद्रता बनकर। जो बुद्धिमानों के हृदय में बुद्धि हैं, सज्जनों में श्रद्धा और कुलीनों में लज्जा हे देवी, हम आपको प्रणाम करते हैं, आप विश्व का पालन कीजिए। और देवताओं ने वह श्लोक कहा, जिसे आज भी करोड़ों लोग संकट में याद करते हैं दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः। हे दुर्गे, स्मरण करने पर आप हर प्राणी का भय हर लेती हैं, और स्वस्थ मन से स्मरण करने पर अत्यंत शुभ बुद्धि देती हैं।
दरिद्रता, दुख और भय को हरने वाली हे देवी, आपके सिवा और कौन है, जिसका हृदय सबका उपकार करने के लिए सदा दया से भीगा रहता हो? शूलेन पाहि नो देवि, पाहि खड्गेन चाम्बिके। हे देवी, अपने शूल से हमारी रक्षा कीजिए, हे अंबिके, अपनी तलवार से रक्षा कीजिए। अपने घंटे की ध्वनि से और धनुष की टंकार से हमारी रक्षा कीजिए।
पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण हर दिशा में हमारी रक्षा कीजिए। इस प्रकार स्तुति करके देवताओं ने नंदन वन के दिव्य फूलों, चंदन और सुगंधित धूप से जगद्धात्री की पूजा की। प्रसन्न होकर देवी बोलीं देवताओं, मुझसे जो चाहो वर माँगो। देवता बोले भगवती, आपने हमारा शत्रु महिषासुर मार दिया, हमारा सब कार्य पूरा हो गया।
फिर भी यदि आप वर देना चाहती हैं, तो जब-जब हम आपको स्मरण करें, आप हमारी बड़ी से बड़ी आपत्ति दूर करें। और हे देवी, जो मनुष्य इन स्तोत्रों से आपकी स्तुति करे, उसे आप धन, संपत्ति, सुख और समृद्धि दें, और उस पर सदा प्रसन्न रहें। देवी ने कहा तथास्तु। और वे वहीं अंतर्धान हो गईं।
महर्षि मेधा बोले हे राजन, इस प्रकार तीनों लोकों का हित चाहने वाली देवी देवताओं के शरीर से प्रकट हुईं। अब सुनो, कैसे वे फिर से माँ गौरी के शरीर से प्रकट हुईं शुम्भ और निशुम्भ का वध करने के लिए। मध्यम चरित्र की सीख महिषासुर रूप बदलता रहा: भैंसा, सिंह, पुरुष, हाथी। हमारे भीतर का अहंकार भी ऐसे ही रूप बदलता है।
और देवी की शक्ति तब प्रकट हुई, जब सब देवताओं ने अपना तेज एक जगह मिला दिया एकता ही सबसे बड़ी शक्ति है। कल, भाग तीन में उत्तम चरित्र का आरंभ: शुम्भ-निशुम्भ, हिमालय पर देवताओं की स्तुति 'या देवी सर्वभूतेषु', और कौशिकी देवी का प्राकट्य। जय माता दी। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
सुनने के लिए धन्यवाद। अगर यह वीडियो आपको अच्छा लगा, तो इसे अपने परिवार के साथ ज़रूर बाँटिए, और ऐसी ही पावन कथाओं के लिए जुड़े रहिए ज्योति यात्रा के साथ। भगवान की कृपा आप पर बनी रहे।



