🪔 नवरात्रि 2026 — नौ देवी, नौ संदेश · भाग 1
नवरात्रि दिन 1 🔱 माँ शैलपुत्री की कथा, मंत्र और पूजा विधि
नवरात्रि दिन 1 🔱 माँ शैलपुत्री की कथा, मंत्र और पूजा विधि | नौ देवी, नौ संदेश
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आज से शुरू हो रही है शारदीय नवरात्रि नौ दिन, नौ देवियाँ, नौ संदेश। और पहला दिन है माँ शैलपुत्री का। देवी कवच में माँ दुर्गा के नौ रूप गिनाए गए हैं प्रथमं शैलपुत्री च, द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। इन नवदुर्गाओं में सबसे पहली हैं शैलपुत्री।
शैल का अर्थ है पर्वत। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण वे शैलपुत्री कहलाती हैं। उनका वाहन वृषभ है, इसलिए उन्हें वृषारूढ़ा भी कहते हैं। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल है, बाएँ हाथ में कमल, और मस्तक पर अर्धचंद्र।
त्रिशूल बुराई से रक्षा का प्रतीक; और कमल कीचड़ में खिलकर भी पवित्र रहने का। पर इस रूप के पीछे एक कथा है। पिछले जन्म में देवी, प्रजापति दक्ष की पुत्री सती थीं, और उनका विवाह भगवान शिव से हुआ था। एक बार दक्ष ने विशाल यज्ञ किया।
सब देवताओं को बुलाया पर शिव को नहीं। सती ने पिता के घर जाने का आग्रह किया। शिव ने समझाया, पर वे चली गईं। वहाँ किसी ने उनका स्नेह से स्वागत नहीं किया, और दक्ष ने सबके सामने शिव का अपमान किया।
पति का अपमान सती सह न सकीं। मान्यता है कि उन्होंने अपनी योगशक्ति से वहीं देह त्याग दी। शिव का शोक असीम था। पर देवी की कथा यहाँ समाप्त नहीं हुई।
वही सती, अगले जन्म में पर्वतराज हिमालय और रानी मैना के घर पुत्री बनकर आईं शैलपुत्री। उन्हें पार्वती और हेमवती भी कहा जाता है। इस जन्म में भी उनका संकल्प नहीं बदला। कठोर तप करके उन्होंने फिर से शिव को पाया।
जो टूटा था, वह और भी दृढ़ होकर जुड़ा। इसीलिए शैलपुत्री, शक्ति का पहला कदम हैं पर्वत जैसी स्थिरता, और एक नई शुरुआत। अब उनका ध्यान मंत्र वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥ अर्थ हम वंदना करते हैं उन यशस्विनी शैलपुत्री की, जो मनोकामना पूरी करती हैं, जिनके मस्तक पर अर्धचंद्र है, जो वृषभ पर सवार हैं और त्रिशूल धारण करती हैं।
और उनका सरल नाम-मंत्र है ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः। इसे शांत मन से एक माला, यानी एक सौ आठ बार, जपा जा सकता है। आज का संदेश पर्वत की तरह स्थिर रहो। तूफ़ान आते हैं, बादल घिरते हैं, पर पर्वत अपनी जगह नहीं छोड़ता।
योग परंपरा में शैलपुत्री को मूलाधार चक्र से जोड़ा जाता है यानी जीवन की नींव। कोई भी साधना, कोई भी अच्छा काम, मज़बूत नींव और स्थिर मन से ही शुरू होता है। सती से शैलपुत्री तक की कथा यह भी सिखाती है अपमान और दुख के बाद भी जीवन फिर से शुरू हो सकता है। नई शुरुआत यही नवरात्रि का पहला संदेश है।
पहले दिन घरों में घटस्थापना होती है मिट्टी में जौ बोकर, उस पर जल से भरा कलश, आम के पत्ते और नारियल रखा जाता है। कई घरों में अखंड दीप भी जलता है। शुभ मुहूर्त अपने पंचांग में देख लें। माँ शैलपुत्री को गाय के घी का भोग लगाने की परंपरा है।
कई जगह इस दिन नारंगी रंग पहनना शुभ माना जाता है। पर याद रखें माँ भाव से प्रसन्न होती हैं, रंग और सामग्री से नहीं। या देवी सर्वभूतेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। कल मिलेंगे माँ ब्रह्मचारिणी के साथ।
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