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🪔 नवरात्रि 2026 — नौ देवी, नौ संदेश · भाग 12

दुर्गा सप्तशती कथा भाग 1 🔱 प्रथम अध्याय — मधु-कैटभ वध

10:58 · 45 दर्शन · 14 घं॰ पहले

दुर्गा सप्तशती कथा भाग 1 🔱 प्रथम अध्याय — मधु-कैटभ वध | नवरात्रि दिन 1 | Durga Saptashati

पूरी कथा पढ़ें

नमस्ते, ज्योति यात्रा में आपका स्वागत है। आज सुनिए पुराणों की एक ऐसी कथा, जो बहुत कम सुनाई जाती है। नवरात्रि के पहले दिन से, करोड़ों घरों में एक ग्रंथ का पाठ शुरू होता है श्री दुर्गा सप्तशती। आज से हम इसकी कथा अध्याय-दर-अध्याय सुनेंगे।

आज भाग एक प्रथम अध्याय, मधु और कैटभ के वध की कथा। दुर्गा सप्तशती को देवी माहात्म्य भी कहते हैं। यह मार्कंडेय पुराण का भाग है सात सौ श्लोक, तेरह अध्याय। इसमें तीन चरित्र हैं प्रथम चरित्र महाकाली का, मध्यम महालक्ष्मी का, और उत्तम महासरस्वती का।

यह वीडियो कथा को सरल हिंदी में समझने के लिए है। संस्कृत पाठ अपनी प्रामाणिक पुस्तक से ही करें। आइए, कथा आरंभ करें। महर्षि मार्कंडेय अपने शिष्य से कहते हैं सूर्य के पुत्र सावर्णि, आठवें मनु कहलाते हैं।

उनके जन्म की कथा सुनो कैसे वे महामाया की कृपा से मन्वंतर के स्वामी बने। प्राचीन काल में, स्वारोचिष मन्वंतर में, चैत्र वंश में सुरथ नाम के एक राजा थे। वे पूरी पृथ्वी के पालक थे, और अपनी प्रजा को अपनी संतान की तरह पालते थे। एक समय कोलाविध्वंसी नाम के राजा उनके शत्रु बन गए।

युद्ध हुआ, और शत्रु संख्या में कम होते हुए भी, सुरथ हार गए। राजा अपनी राजधानी लौट आए। पर दुर्भाग्य यहीं खत्म नहीं हुआ उनके ही बलवान और दुष्ट मंत्रियों ने खजाना और सेना अपने कब्ज़े में ले ली। अपना राज्य खोकर, राजा सुरथ शिकार के बहाने अकेले घोड़े पर सवार होकर घने वन की ओर चल दिए।

वन में उन्हें महर्षि मेधा का आश्रम मिला। वहाँ हिंसक पशु भी शांत होकर रहते थे, और ऋषि के शिष्य उनकी शोभा बढ़ाते थे। मुनि ने राजा का आदर-सत्कार किया, और राजा कुछ समय वहीं रहने लगे। पर आश्रम की शांति में भी उनका मन शांत नहीं हुआ।

वे सोचते जिस नगर को मेरे पूर्वजों ने पाला, वह आज मेरे बिना है। क्या मेरे दुष्ट सेवक धर्म से उसकी रक्षा कर रहे होंगे? मेरा प्रधान हाथी, जो सदा मद में रहता था वह शत्रुओं के हाथ में न जाने कैसे भोग पा रहा होगा। जो लोग मेरी कृपा से धन और भोजन पाते थे, वे अब दूसरे राजाओं की सेवा कर रहे होंगे।

मेरा संचित खजाना वे लुटा देंगे। इन्हीं विचारों में डूबे राजा ने आश्रम के पास एक वैश्य को देखा। राजा ने पूछा तुम कौन हो, यहाँ क्यों आए हो? तुम इतने उदास क्यों हो?

वैश्य बोले मेरा नाम समाधि है। मैं धनवान कुल में जन्मा। पर धन के लोभ में मेरी अपनी पत्नी और पुत्रों ने मुझे घर से निकाल दिया। मेरे विश्वसनीय बंधुओं ने मेरा धन छीन लिया, और दुखी होकर मैं वन में आ गया।

और फिर समाधि ने वह बात कही जो हम सबकी कहानी है फिर भी मेरा मन उन्हीं की चिंता करता है। मेरे पुत्र, मेरी पत्नी, मेरे बंधु क्या वे कुशल हैं? क्या वे सदाचारी हैं या दुराचारी? राजा ने आश्चर्य से पूछा जिन लोभी लोगों ने तुम्हें धन के लिए घर से निकाल दिया, उन्हीं के लिए तुम्हारा मन इतना स्नेह क्यों रखता है?

समाधि बोले मैं भी यही सोच रहा हूँ। जानता हूँ कि वे गुणहीन हैं, फिर भी मेरा मन उन्हीं की ओर खिंचता है। दोनों महर्षि मेधा के पास गए, प्रणाम किया, और राजा ने पूछा भगवन, राज्य छिन जाने पर भी मेरा मन उसी में अटका है, यह जानते हुए भी कि वह अब मेरा नहीं। और इन वैश्य को अपनों ने ठुकराया, फिर भी उनका मोह नहीं छूटता।

हम दोनों दोष देखते हुए भी मोह में फँसे हैं। हम ज्ञानी होकर भी इतने मूढ़ क्यों हैं? यह मोह कहाँ से आता है? महर्षि मेधा बोले हे राजन, विषयों का ज्ञान तो सब प्राणियों को होता है।

पक्षियों को देखो स्वयं भूखे होते हुए भी, मोह के कारण वे अपने बच्चों की चोंच में दाना डालते हैं। मनुष्य भी उपकार की आशा में अपनी संतान से ममता रखते हैं। ममता के इस भँवर में, मोह के इस गड्ढे में, सबको डालने वाली हैं संसार का पालन करने वाली भगवान विष्णु की योगनिद्रा, महामाया। ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा, बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।

— वह भगवती महामाया ज्ञानियों के मन को भी बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं। वही इस सारे चराचर जगत को रचती हैं। वही प्रसन्न होकर मनुष्य को मुक्ति का वरदान देती हैं। वही परम विद्या हैं, संसार-बंधन का कारण भी, और उससे छुड़ाने वाली भी।

राजा ने पूछा भगवन, जिन्हें आप महामाया कहते हैं, वे देवी कौन हैं? उनकी उत्पत्ति कैसे हुई, उनका स्वरूप क्या है, उनके कर्म क्या हैं? मैं सब सुनना चाहता हूँ। मेधा बोले वे नित्य हैं, जगत उन्हीं का रूप है, उन्हीं से सब व्याप्त है।

फिर भी देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए जब वे प्रकट होती हैं, तब कहा जाता है कि देवी उत्पन्न हुईं। सुनो, कैसे। कल्प के अंत में जब सारा संसार एक महासागर में डूबा था, तब भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में सो रहे थे। उस समय विष्णु के कानों के मैल से दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए मधु और कैटभ।

वे विशाल थे, बलशाली थे, और उनकी आँखें क्रोध से जल रही थीं। विष्णु की नाभि से निकले कमल पर प्रजापति ब्रह्मा जी बैठे थे। वे दोनों असुर ब्रह्मा जी को मारने के लिए आगे बढ़े। ब्रह्मा जी ने देखा कि भगवान विष्णु सो रहे हैं, और असुर सामने हैं।

उन्होंने विष्णु को जगाने के लिए, उनके नेत्रों में बसी योगनिद्रा देवी की स्तुति शुरू की। त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका। — हे देवी, तुम ही स्वाहा हो, तुम ही स्वधा, तुम ही वषट्कार। तुम ही स्वर हो, तुम ही अमृत, तुम ही अक्षर ओंकार की अर्धमात्रा।

तुम ही संध्या हो, तुम ही सावित्री, तुम ही परम जननी। तुमसे ही यह विश्व रचा जाता है, तुम ही इसका पालन करती हो, और कल्प के अंत में तुम ही इसे अपने में समेट लेती हो। तुम ही महाविद्या हो, महामाया, महामेधा, महास्मृति। तुम ही कालरात्रि हो, महारात्रि, और मोहरात्रि।

तुम ही लक्ष्मी हो, ईश्वरी हो, लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शांति और क्षमा हो। जब भगवान विष्णु, जो जगत की रचना, पालन और संहार करते हैं, उन्हें भी तुमने निद्रा के वश कर दिया है तो तुम्हारी स्तुति कौन कर सकता है? हे देवी, इन दोनों असुरों को मोहित करो, और भगवान को जगाओ। ब्रह्मा जी की स्तुति से प्रसन्न होकर, तामसी देवी योगनिद्रा भगवान विष्णु के नेत्र, मुख, नासिका, भुजाओं, हृदय और वक्षस्थल से निकलकर ब्रह्मा जी के सामने प्रकट हुईं।

योगनिद्रा के हटते ही जगन्नाथ भगवान विष्णु शेष-शय्या से उठ बैठे। उन्होंने देखा दो महाबलशाली असुर, क्रोध से लाल आँखें लिए, ब्रह्मा जी को खाने को तैयार खड़े हैं। भगवान श्रीहरि उठे और उन असुरों से बाहुयुद्ध करने लगे। यह युद्ध पूरे पाँच हज़ार वर्षों तक चलता रहा न असुर थके, न भगवान।

तब महामाया ने उन असुरों की बुद्धि को मोह लिया। बल के घमंड में चूर होकर वे भगवान से बोले हम तुम्हारी वीरता से प्रसन्न हैं। माँगो, तुम्हें क्या वर चाहिए? भगवान बोले यदि तुम सच में मुझसे प्रसन्न हो, तो यही वर दो कि अभी तुम दोनों मेरे हाथों मारे जाओ।

मुझे और किसी वर से क्या काम? वचन देकर असुर फँस गए। उन्होंने चारों ओर देखा सब ओर जल ही जल था। वे बोले ठीक है, हमें वहाँ मारो, जहाँ पृथ्वी जल में डूबी न हो।

शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान ने कहा तथास्तु। और उन्होंने दोनों असुरों को अपनी जंघा पर रखकर, सुदर्शन चक्र से उनका अंत कर दिया। इस प्रकार ब्रह्मा जी की स्तुति से स्वयं प्रकट होने वाली यह देवी हैं महाकाली। यही प्रथम चरित्र की देवता हैं।

महर्षि मेधा कहते हैं अब इन देवी के प्रभाव की और कथा सुनो। प्रथम अध्याय का पाठ नवरात्रि के पहले दिन होता है। परंपरा में सप्तशती के पाठ से पहले कवच, अर्गला और कीलक का पाठ किया जाता है। सही विधि अपने कुल की परंपरा और प्रामाणिक पुस्तक से जानें।

इस अध्याय की सबसे बड़ी सीख मोह हमें वहीं बाँधता है, जहाँ से हमें दुख मिला। ज्ञान होते हुए भी मन क्यों नहीं मानता इसका उत्तर है माँ की शरण। जो मोह में डालती हैं, वही मुक्त भी करती हैं। और दूसरी सीख मधु और कैटभ घमंड के प्रतीक हैं।

जब घमंड बुद्धि ढक लेता है, तब शत्रु भी अपना अंत स्वयं माँग लेता है। माँ से प्रार्थना करें कि हमारे भीतर का घमंड और मोह मिटे। कल, भाग दो में मध्यम चरित्र, जब सारे देवताओं के तेज से माँ दुर्गा प्रकट होंगी, और महिषासुर की सेना से युद्ध होगा। जय माता दी।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। सुनने के लिए धन्यवाद। अगर यह वीडियो आपको अच्छा लगा, तो इसे अपने परिवार के साथ ज़रूर बाँटिए, और ऐसी ही पावन कथाओं के लिए जुड़े रहिए ज्योति यात्रा के साथ। भगवान की कृपा आप पर बनी रहे।

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